बुधवार, ४ नवम्बर २००९

मुझे तलाश है ऐसे लेखक की जिसमें इन्सान हो

आज़ादी के बाद हिन्दी साहित्य में आ रहे परिवर्तन में सबसे खास परिवर्तन खेमेबाजी है । शक्तिसम्पन्न और बौद्धिक संवर्ग ने अपने अपने अलग अलग खेमे बना लिए है । इन अलग अलग खेमों में बंटे लेखकों और कवियों की विचारधारा भी अलग अलग ही है । बौद्धिक और शक्तिसम्पन्न लेखकीय समुदाय ने अपने खेमे से पृथक किसी अन्य को लेखक मानने से ही इन्कार कर दिया है। उत्तर आधुनिक लेखक अब तक पूर्णतः आधुनिक नहीं हुए है किन्तु वे सारे के सारे उत्तर औधुनिक का अलाप,अलाप रहे हैं । रचनात्मकता में विचारधारा के सम्मोहन का तड़का लगाया जा रहा है । उत्तर आधुनिक के नाम पर काव्य और गद्य में भी अकाव्यात्मकता एवं अगद्यात्मकता का पुट लगाया जा रहा है । इस तरह की रचनाएं की जा रही है,जिसका सामान्य पाठक वर्ग से कोई सारोकार नहीं है । खेतों में काम करनेवाले,सड़क किनारे काम करनेवाले मजदूर,कारखानों में कार्यरत वर्कर्स अगद्यात्मक और अकाव्यात्मकता को आत्मसात करने में असमर्थ तो है ही साथ ही इस प्रकार की रचनाओं से न तो व्यक्ति को,न परिवार को, न समाज को और ना ही देश को लाभ पहुंचता है। हां,रचनाकार अवश्य ही खेमेबाजी में बाजी मारकर अनावश्यक तौर पर पुरस्कार सम्मान प्राप्त कर ले जाते है । इसका भी कारण है,उत्तर आधुनिक के नाम पर रचनाकार खेमों के ही सम्पादकों और आलोंचकों को खुश करने के लिए लिखते हैं । उत्तर आधुनिकता के नाम पर लिखा जानेवाला साहित्य न तो समाज के और न ही देश के हित में है । मैं यहां किसी की आलोचना या निन्दा नहीं कर रहा और ना ही अपने गाल बजा रहा हूं किन्तु वास्तविकता यही है कि एक शक्तिसम्पन्न वर्ग सामान्य पाठकों के सामने केवल बौद्धिक कचना परोसकर वाह वाही लुटने में संलग्न है ।
भवानी प्रसाद ने लिखा है,रचना इस तरह से लिखी जानी चाहिए,जिस तरह से रचनाकार सरल होता है । रचनाकार कठिन होगा तो रचना भी कठिन होगी और उसका जनता,समाज या देश से प्रत्यक्षतः कोई सरोकार नहीं होगा । आज यही हो रहा है । यही कारण है कि समाज बौद्धिकता से उब कर सिनेमा की ओर जा रहा है । पुस्तकें नहीं बल्कि टीव्ही और सिनेमा का क्रेज बढ़ता जा रहा है ।......------------------.आज स्थिति दयनीय हो गई है। एक खेमे का रचनाकार दूसरे खेमे के रचनाकार को बरदाश्त नहीं करता । इतना ही नहीं प्रसिद्ध रचनाकारों का रवैया असामजिक हो गया है । माना जाता है कि लेखक.रचनाकार संवेदनशील होता है किन्तु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि बौद्धिक लेखक संवेदनशील नहीं होता । इसे यों भी कहा जा सकता है कि एक अच्छा लेखक उतना अच्छा इन्सान नहीं होता,भले ही एक अच्छा इन्सान अच्छा लेखक न हो । एक अच्छा लेखक भले ही मिल जाए किन्तु वह एक अच्छा इन्सान हो,यह जरूरी नहीं है । एक कोई अवश्य ऐसा लेखक होगा किन्तु उसकी पहुंच उतनी अच्छी नहीं होगी जितनी उसे चाहिए । अच्छे लेखक के साथ अच्छा इन्सान होना बड़े सौभाग्य की बात है । आजकल के लेखक कवि रचनाकार इतने ज्यादा बौद्धिक हो गए है कि वे ज़मीन पर तो चलते ही नहीं है बल्कि वे आसमान में उड़ने लगते है । वे पत्रोत्तर देना अपनी तोहिन समझते हैं ।-------------.मैंने अब तक कई लेखको को पत्र लिखे हैं । उन्हें अपनी पुस्तकें भेजी है,दी है किन्तु दुःख की बात है कि उनमें से अब तक हरिवंशराय बच्चन,विष्णुप्रभाकर,कमलाप्रसाद,विजयबहादरसिंह आदि ने ही पत्रों का जवाब दिया बाकी किसी ने भी नहीं । यहां यह भी कहना उचित होगा कि भले ही उनकी सूची में मैं नहीं हूं । सूची में आने के लिए शायद उनकी शर्तें पूरी न कर पाया हूं । कई लेखक तो ऐसे है कि उनकी तारीफों में बड़े लेखकौं ने जाने कितने कशीदे रच डालें किन्तु उनमें लेखक तो है किन्तु उनमें इन्सान ही नहीं है ।

गुरुवार, २९ अक्तूबर २००९

खुश रहो पूरे साल भर

दीपावली आई रोशनी लेकर और रोशन कर दिया हर दिल ,हर जीवन और हर घर को । इसी तरह आज देवउठनी एकादशी है । इस अवसर पर हम ईश्वर से मांगे,जो भी कार्य हम करें,वह सफल हो और जो भी शुभ कार्य करें उसमें सफलता हासिल हो । साथ ही जो भी विवाह हो,उन सभी विवाहित लोगों के जीवन में प्रकाश भर दें । साल भर तक प्रत्येक व्यक्ति खुशहाल रहे । बस,ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है।
आप सभी के लिए ढ़ेर सारी खुशियां प्रभु से चाहता हूं।

आपका अपना
कृष्णशंकर सोनाने

शुक्रवार, १६ अक्तूबर २००९

सकारात्मक सोच

व्यक्ति का जीवन भावों के आधार पर चलता है। भाव ही जीवन का स्वरूप तय करते हैं, जीवन को गति प्रदान करते हैं और विश्व में व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी करते हैं। भाव मन की इच्छा के साथ चलते हैं, इन पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता। व्यक्ति चाहे कि वह किसी इच्छा को पैदा ही न होने दे अथवा किसी विशेष प्रकार की इच्छा ही पैदा हो, यह सम्भव नहीं है। इच्छा को मन का “रेत” कहते हैं। “रेत” शब्द यहां बीज रूप में प्रयोग किया गया है। इच्छा मन की स्वाभाविक गति है। व्यक्ति के हाथ में है इच्छा का आकलन करके निर्णय करना कि इच्छा को पूरी करे अथवा न करे। कब पूरी करे, कैसे पूरी करे, यह निर्णय व्यक्ति के भावों पर आधारित होता है।
जब व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य तय कर लेता है तथा जब वह एक लक्ष्य बनाकर कार्य करता है तो उसके भाव भी उसी के अनुरूप ढलने लगते हैं। व्यक्ति उसी प्रकार के भावों का अभ्यस्त होने लग जाता है। मन में उठने वाली इच्छा को वह अपने भावों के अनुरूप ढालने का प्रयत्न करता है।
जिस व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य नहीं बन पाता, उसके लिए इच्छा का महžव ही नहीं होता। वह इच्छा का जीवन-विकास में सदुपयोग नहीं कर सकता। प्रतिबिम्बित मन च†चल होता है। वह दिन में अनेक बार बदलता है, मरता है, नया पैदा होता है, हर इच्छा के साथ। वातावरण मन को बदलने में सहायक होता है। वातावरण के अनुरूप ही इच्छा का स्वरूप बन जाता है। व्यक्ति हवा के झोंके के साथ इधर-उधर डोलता है। एक दिशा में नहीं चल सकता। इसके अलावा, जीवन परिवर्तनशील भी होता है। परिवर्तन सृष्टि का अंग है। सृष्टि स्वयं परिवर्तनशील है। इसी के साथ उसके मन में परिवर्तन आते हैं। जीवनचर्या में परिवर्तन आते हैं। कामकाज के ढंग में परिवर्तन आते हैं। आज तो परिवर्तन की गति इतनी बढ़ गई है कि व्यक्ति स्वयं को इस गति से बदलने में असहाय पाता है। इस बात का भय हो गया है कि यदि समय के साथ नहीं बदल पाया तो क्या होगा।
हर परिस्थिति में व्यक्ति की भावभूमि ही निर्णायक सिद्ध होती है। उसी के अनुरूप बुद्धि कार्य करती है, शरीर चलता है और कार्यो का निष्पादन होता है। भावभूमि के दो मुख्य पहलू हैं सकारात्मक और नकारात्मक। भाव हमारे चिन्तन का आधार है। हमें अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त हो और अप्रिय वस्तु से छुटकारा प्राप्त कर सकें, इसी ऊहापोह में व्यक्ति लगा रहता है। उसके चिन्तन का भी यही आधार होता है। प्रिय वस्तु हाथ से छूटे नहीं, यह भी चिन्ता रहती है। व्यवहार में सब कुछ असम्भव है। प्रिय हो अथवा अप्रिय, सदा उसका योग बना ही रहे, यह सम्भव नहीं है। सब संयोग से चलता है। हम प्रिय के जाने से भी दु:खी होते हैं और अप्रिय के आने से भी।
इसी प्रकार, अनेक स्थितियां हमारे चिन्तन एवं कर्म को प्रभावित करती रहती हैं। इन स्थितियों में यदि हम सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं तो अलग चित्र बनता है और नकारात्मक दृष्टिकोण से अलग बनता है। सकारात्मक भाव कल्याण-सूचक होते हैं, मैत्री, करूणा, दया, आनन्द आदि भावों से युक्त होते हैं। आशावाद से जुड़े होते हैं। नकारात्मक भावों में राग, द्वेष, ईष्र्या, लोभ, अहंकार आदि का प्रभाव विशेष होता है। निराशा का भाव बलशाली होता है। मन अनेक आशंकाओं से घिरा रहता है।
प्रकृति, आकृति और अहंकृति एक साथ ही उत्पन्न होती हैं। एक-दूसरी के अनुरूप होती हैं। व्यक्ति की शिक्षा का उद्देश्य होता है इनको समझना और उसी के अनुरूप चिन्तन करना। इनमें जो ग्राह्य हो, उन्हें विकसित करना और जो अवांछनीय हों, उन्हें त्याग देना। जीवन को दिशा देने का कार्य यहीं से शुरू हो जाता है। एक बार भाव-क्रिया समझ में आ जाए और एक दिशा तय हो जाए तो बुद्धि और शरीर वैसे ही कार्य करने लगते हैं। शुद्ध सकारात्मक भाव वाले व्यक्ति का चेहरा चमकता हुआ दिखाई पड़ता है। तेजस्वी लगता है। उसका सान्निध्य सुख देता है। नकारात्मक भावभूमि से चेहरे पर कालिमा छा जाती है, आकृति क्रूर दिखाई पड़ती है। भय प्रतीत होता है।
हम कार्य कुछ भी करें, किसी भी स्तर का जीवनयापन करें, भावों की सकारात्मकता से ही हमें सुख की अनुभूति हो सकती है। सकारात्मकता की एक विशेषता यह भी है कि इसमें व्यापकता का भाव होता है। संकुचन भाव नहीं होता, स्वार्थ भाव भी नगण्य होता है। विश्व-मैत्री अथवा प्राणि-मात्र के प्रति करूणा का भाव विकसित हो जाता है। इसका लाभ यह होता है कि व्यक्ति प्रतिक्रिया से मुक्त हो जाता है। प्रतिक्रिया अनेक तनावों को जन्म देती है। व्यक्ति अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प में उलझा रहता है। वास्तविकता से दूर भी हो जाता है। क्रिया हो और प्रतिक्रिया न हो तो यह तनाव से मुक्ति ही है। मैत्रीपूर्ण भाव व्यक्ति को सृष्टि के साथ जोड़े रखता है। वह स्वयं को कभी अकेला महसूस नहीं करता। सदा अप्रमत्त रहता है। प्रतिक्रिया न होने से शान्त होने लगता है। वह धीरे-धीरे मितभाषी और मिताहारी बन जाता है। शक्ति-संचय करता है। शक्ति का उपयोग जनकल्याण में करता है। उसके उत्थान का मार्ग सदा प्रशस्त रहता है।
सकारात्मक भाव का एक लाभ यह भी है कि व्यक्ति वर्तमान में जीना सीख लेता है। न उसे स्मृति के जाल में अटकना पड़ता है और न ही कल्पना लोक के स्वप्न आते हैं। हर कठिन कार्य सरलता से हो जाता है। नकारात्मक भाव अहितकारी भी होते हैं और हिंसकवृत्ति वाले भी। व्यक्ति करने से पूर्व भी चिन्तित रहता है, करते समय भी चिन्तित रहता है और करने के बाद भी चिन्ता-मुक्त नहीं हो पाता। नकारात्मक भाव व्यक्ति को आशंकाओं से इतने ग्रस्त रखते हैं कि वह कुछ शुरू करने से पहले ही ठिठक जाता है। न सफलता, न सुख। अत: यदि नकारात्मक भाव आ भी जाएं तो उन पर विचार किए बिना दूसरे विषय को पकड़ लेना चाहिए। नकारात्मक भावों का कभी पोषण नहीं करना चाहिए। कोई भी कार्य, जिसमें ऎसे भावों का पोषण हो, त्याग देना चाहिए। आज टेलीविजन पर आने वाले अपराध भाव तथा सिनेमा से प्रसारित नकारात्मक भावों से समाज त्रस्त है। निरन्तर इनका पोषण हो रहा है। अखबार भी धीरे-धीरे इस ओर अग्रसर हैं। किसी को इसका आभास ही नहीं है कि धीमे जहर की तरह इस नकारात्मकता का प्रभाव मानवता पर कितना पड़ेगा! ये नकारात्मक भाव ही तो हैं, जो आगे चलकर शरीर में विभिन्न प्रकार की व्याधियों को जन्म देते हैं।

अध्यात्म अशश्व प्रेम का चरणामृत पान

वैलेंटाइन दिवस और साथ ही वसंत रितु आगमन । यह रितु प्रेम रोमांस की है। श्रीमदभागवत महापुराण में वर्णन है कि इस रितु में ही श्रीक़ृष्ण ने वृन्दावन में गोपियों के संग रासलीला की थी । और उमा ने ,इसी रितु में,शिव का प्रेम प्राप्त करने हेतु, तपस्या की थी । प्राचीन काल से ही, हमारे देश में यह समय प्रेम,प्रणय और रोमांस का रहा है।
श्री रविशंकर कहते हैं,प्रेम मनुष्य की प्रक़ृति है।यह मानव की सहज,स्वाभाविक,मूल प्रक़ृति है,गुण है,अत: मनुष्य इससे बच नहीं सकता,वह प्रेम करेगा ही । महात्मा गॉंधी ने कहा है,प्रेम कभी ‘मांग’ नहीं करता,यह सदैव देता है,अर्पित करता है।वास्तविक प्यार तो तभी है,जब व्यक्ति को अपने प्रेमी और प्रेम पात्र से कोई अपेक्षा न हो,जब व्यक्ति उससे एकनिष्ट,हार्दिक प्रेम करें और बदले में उससे कुछ भी प्राप्त करने की आशा,चेष्टा न रखें।अत: प्रेम किसी लालसा,उत्कंठा के अपेक्षाकृत,एक
नि:स्वार्थ,उच्चस्तरीय,विशिष्ठ अनुभव,हार्दिक रूप से एक समर्पित रिश्ता है।
इस कथन की पुष्टि संत तुलसीदास ने भी की है । विशुद्ध प्रेम का वर्णन करते हुए तुलसीदास ने कहा है कि प्रेम को परिष्कृत करके हृदय में पालना पडता है। यह किसी चाह इच्छा अथवा मांग से दूषित नहीं होता । यह एक नि:स्वार्थ भाव होता है। जैसे,चातक पक्षी को देखें,जिसका मेघ के प्रति प्रेम कितना विशुद्ध है।मेघ तो कभी कभी चातक को विचलित करने हेतु अंघड तूफान भेजता । अपने प्रेमी मेघ के इन सभी दुर्व्यवहार की सर्वथा अनदेखी करता और इन प्रतिकूल हानिकारक परिस्थितियों में भी इसका प्रेम प्रभावित नहीं होता,कम नहीं होता । कहते हैं,भगवान श्रीकृष्ण का पेट दर्द हो रहा था । तमाम चिकित्सा के बाद भी जब किसी भी औषधि से ठीक नहीं हो पा रहा था तो उन्होने किसी ऐसे व्यक्ति के चरणामृत की मांग की जो उनसे वास्तविक प्रेम करता हो। श्रीकृष्ण ने रूक्मणि से अपना चरणामृत देने को कहा।किन्तु रूक्मणि ने यह कहकर मना कर दिया कि सर्व विश्व के भगवान को अपना चरणामृत पिलाकर घोर पाप का भागी नहीं बनूंगी।तमाम पटरानियों ने भी अपना चरणामृत देने से इन्कार कर दिया।यहॉं तक कि सत्यभामा ने भी इन्कार करदिया किन्तु राधा ने,सहेलियों के मना करने के बावजूद भी अपना चरणामृत भेज दिया,यह कहते हुए कि मैं अपने प्रेमी का दर्द नहीं देख सकती,भले ही मुझे नर्क में जाना पडे। इसे पीकर श्रीकृष्ण स्वस्थ्य हो गए । यह राधा का श्रीकृष्ण के प्रति सच्चा तथा वास्तविक प्रेम था ।
आज शाश्वत का श्रीकृष्ण का स्वरूप सर्वथा परिवर्तित है,बदला है। संत वेलेन्टाइन के प्रेम संदेश से संत की मंशा को पूर्णतया खारिज कर दिया गया । आज यह आधुनिक भौतिकता के रंग से सराबोर है।

रविवार, ११ अक्तूबर २००९

हिन्दू खान भाई-

उसे यह पता नहीं कि उसका यह नाम कैसे पड़ा । कोई कहता उसके पिता मुस्लिम थे और माँ हिन्दू तो कोई कहता उसकी माँ मुस्लिम थी और पिता हिन्दू । कोई कोई और कुछ कहता लेकिन जबसे उसने होश संभाला है तब से उसे यह आभास होने लगा है कि वह हिन्दू भी है और मुस्लिम भी है। उसे नहीं पता,वह कब से पाँचों वक्त की नमाज अदा करने लगा है और उसे यह भी नहीं पता कि वह कब से रोज़ सुबह उठकर घर के कोने में प्रतिस्थापित भगवान की प्रतिमा की आरती उतारता रहा है। वह हिन्दुओं के त्यौहारों पर ,चाहे वह गणेश पूजन हो,डोल ग्यारह हो,नवरात्रा में दुर्गा पूजन हो,रामनवमी हो या कृष्ण जन्माष्टमि हो,मनाता रहा है।

वह चारों धाम की यात्रा भी कर आया है और हज़ भी कर आया है। वह एकादशी,नवरात्रा व्रत,सत्यनारायण व्रत,जन्माष्टमी व्रत भी रखता है तो रोजे भी रखता है। वह गीता रामायण पढ़ता है तो कुरान शरीफ भी पढ़ता है।उसे तो बस इतना पता है कि वह हिन्दुओं के सारे पूजा पाठ से लेकर मुस्लिमों की सारी इबादतें भी करता रहा है। मुस्लिमों के सारे त्यौहार मनाता है । मीठी ईद,बकर ईद,शब्बारात से लेकर पीरगाहों तक वह इबादत करने जाता है। वह मन्दिरों में दोंनों वक्त जाता है तो मस्जिदों में भी नमाज अदा करने जाता है। हाँ,लेकिन उसने लिबास में बदलाव न लाते हुए महात्मा गाँधी का अनुसरण करते हुए सादा लिबास पसन्द किया 1

वह अक्सर खादी की धोती और खादी का ही कुर्ता पहनता है। कभी जूता नहीं पहनता बल्कि खादी भण्डार जाकर अपने लिए सारा चप्पलें ले आता है। यही है उसका पहनावा । इसी पहनावे को लेकर मोहल्ले के लोग,दोस्त और साथ में उठने बैठनेवाले उसे हिन्दू खान भाई कहकर सम्बोधित करते है।मित्रों और परिचितों में वह दो तरह से जाना जाता है। हिन्दू उसे हिन्दू भाई से सम्बोधित करते तो मुस्लिम उसे खान भाई से सम्बोधित करते । कोई उससे पूछता है कि उसके माता पिता का नाम क्या है तो वह हंसकर बताता है कि उसकी माता का नाम भारत माता है और पिता का नाम हिमाला है। वह अपना मज़हब भारतीय बताता । वह कहता है जिस देश में हिन्दू मुस्लिम एकता और भाईचारे के साथ रहते है वहाँ हिन्दू और मुस्लिमों में कोई भेद ही नहीं है। यह भेदभाव हिन्दू मुस्लिमों में नहीं है लेकिन इस भेदभाव की खाई नेताओं ने अपने स्वार्थ को लेकर तैयार की है।
हम भारतियों में फूट डालकर राज करने के लिए तैयार की है ताकि हम लोग आपस में लड़ते मरते रहें और ये नेता हम पर राज करते रहे । हमारा शोषण करते रहे ।करीब पच्चीस तीस बरस पहले वह काजी बाबा को एक मेले में मिला था । बाबा बताते हैं ,शहर में कोई मेला लगा था और वह उसी मेले में रोते बिलखते हुए मिला था।पहले तो पुलिस से सहायता ली कि इसके मां बाप का पता लगाकर इसे उनके सुपुर्द कर दें लेंकिन उसे मां बाप का पता नहीं चला । पुलिस उसे अनाथालय भेज रही थी किन्तु काजी बाबा के अनुरोध पर पुलिस ने उसे उन्हें दे दिया । काजी बाबा उसे अपने साथा ले आए । काजी बाबा इस आसमंजस्य में पड़ गए थे कि वह जाने किस मज़हब का है हिन्दू है या मुस्लिम है। उन्होंने इस पचड़े में पड़ने की बजाय उसे दोनों मजहबों की तालीम देने लेगे । उसे कुरानशरीफ से लेकर गीता रामायण तक की शिक्षा दी । इबादत नमाज रोजे से लेकर पूजा पाठ और व्रत उपवास करना भी सिखाया ।
अब की बार ईद और दीपावली साथ साथ आई थी । शायद दीपावली के बाद ईद पड़ी थी । उसने दीपावली और ईद मनाने की तैयारी साथ साथ शुरू कर दी थी । महिने भर पहले से ही वह इस तैयारी में लग गया था । वह जितनी तवज्जो मुस्लिम मज़हब को देता उतनी ही हिन्दू मजहब को दे रहा था ।अभी दो दिन ही त्यौहारों के बाकी थे कि राजनीति के चलते मन्दिर मस्जिद विवाद के बहाने दोनों समुदाय में दंगे का महौल बन गया । दोनों एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो गए

उस रोज़ वह घर में ही था । काजी बाबा मस्जिद गए हुए थे। बाहर शोरगुल सुनकर वह बाहर आ गया । देखता है,दरवाज़े की एक ओर दस बीस हिन्दू हथियार लिए खड़े है तो दरवाज़े की दूसरी ओर भी इतने ही मुस्लिम भी हथियार लिए खड़े है। वह समझ नहीं पाया कि इतने सारे लोग हथियार लिए उसके दरवाज़े के सामने इस तरह क्यों खड़े है। वह दोनों ओर देखते ही रह गया । हिन्दु्ओं ने हथियार उठाए और ऊँची आवाज़ में बोले-
” मारो,मारो , बच न पाएं ।”
दूसरी ओर से मुस्लिम भी ऊँची आवाज़ में बोले-
” मारो,मारो , बच न पाएं ।”
हिन्दुओं और मुस्लिमों ने हथियार उठा लिए ।अब तक वह स्थिति समझ चुका था । वह चीख पड़ा-
” किसको मारोगे,मुझको,क्या मैं हिन्दू नहीं हूँ या क्या मैं मुस्लिम नहीं हूँ । बताओ मैं कौन हूँ।”
उसका इस तरह चीखकर प्रश्न करना हिन्दुओं और मुस्लिमों को भारी पड़ रहा था । वे समझ नहीं पा रहे थे कि जिसे वे मारने के लिए यहाँ एकत्र हुए है,वह हिन्दू है या फिर मुस्लिम है। वह फिर चीख पड़ा-
"तुम में जो हिन्दू है वह मुस्लिम समझ कर मुझे मारें और तुममें जो मुस्लिम है वे हिन्दू समझकर मुझे मारें। बताओ तुम किसको मारना चाहते हो । क्या तुम बता सकते हो कि मैं हिन्दू हूँ या मुस्लिम । मैं एक इन्सान हूँ क्या तुम लोग एक इन्सान को मारना चाहते हो,तो मारों,मैं यह खड़ा हूँ ।"
हिन्दू और मुस्लिम समझ नहीं पा रहे थे कि वह उसे क्या समझ कर मारें। हिन्दू या मुस्लिम। उनके हथियार उठे के उठे ही रह गए ।

कृ

पगली

बचली जा रही वह न जाने किधर को।
थोडी नाजुक सी थोडी शरमिली सी
लिबास उघडे से कमर चलकीली सी
शरारत करती सी बिखेरती तबस्सुम सी
गुनगुनाती सी नयन मटकाती सी
चली जा रही वह न जाने किधर को।

बचली जा रही वह न जाने किधर को।
चली जा रही वह न जाने किधर को।।
ताजमहल सा हुस्न खूबसूरत उसका
महताब सा दमकता मेहताबे-रूख उसका
गदराया गदराया उसका वह बदन
महकता हुआ जैसे कहते है सन्दल
बलखाती हुई वह चलती है ऐसे
बहारे-बसन्त की मचले हो जैसे
हंसती है ऐसे जैसे झरनों सा झर झर
मचलती है ऐसे जैसे हवाएं हो सरसर
जा रही जैसे नदिया सागर से मिलनेा

बचली जा रही वह न जाने किधर को।
चली जा रही वह न जाने किधर को।।

बडी बदमिजाज पगली इक लडकी
गजलों को गीतो सा गुनगुनाया है करती
गुल चुनती है वह बागानों में हर रोज
साथ कलियों के खिली जा रही है
पेड-पौधों लताओं बहारों को लिए
मिलन पिया से चली जा रही है
हवाओं संग संग उड जाती है वह
दूर गगन से लौट आती है वह

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
गजलों को गीतों सा गुनगुनाया है करती।।

बडी बदहवास पगली इक लडकी
रोती है न वह कभी हंसती है
राह में खडे-खडे वह हमेशा
राह महबूब की वह तकती है
सजाया करती वह रहगुजर पिया की
कलियॉं गुलों को वह बिखराया करती
धोती है ऑंसुओं से राह महबूब की
रोते-रोते नग्में महबूब के गाया वह करती

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
सजायाकरती वह रहगुजर पिया की।।

खत ले आता कासिद कभी तो
खते-महबूब सीने से लगाया करती
रहगीत कहीं से आ रहा हो कभी तो
संदेश महबूब को पहुँचाय वह करती
चॉंद से हैं पूछती वह चॉंदनी है पूछती
हवाओं परिन्दों और घटाओं से वह पूछती
कोई तो संदेशा मेरे महबूब का बताओ
या संदेशा मेरा लेकर कोई जाओ
ये ऑंसू रो-रोकर पुकारा है करते
पहाडों दरियाओं कहीं पता तो बताओ
आ रहा कब मेरा महबूब परदेश से

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
चली जा रही वह न जाने किधर को।।

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
सियातरे सजाती बहारें सजाती
सजधन के सरे-राह बैठ वह जाती
बागाें से कहती नजारों से कहती
राहों से पूछती रहगिरों से पूछती
आज आनेवाला मेरा जाने-महबूब है
खुदा का वास्ता मैंने दिया उसे है
अल्ला को खबर मौला को खबर है
महबूब मेरा आनेवाला इधर है
खुदारा कोई राह रोके न इधर की

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
सितारे सजाती बहारे सजाती।।

हिंडोले में चॉंद के है वह झूलती
संग महबूब के है वह डोलती
चहचहाती है वह मुस्कराती है वह
रंग बहारें के है वह लुटाती
कूकती वह कोयल सी कभी है
रक्स करती वह मयूरा सी कभी है
पुकारा करती है वह नाम ले के महबूब का
बहारों को सितारों को लुटाया है करती

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
रक्स करती वह मयूरा सी कभी है ।।

दौडती है वह धरती से गगन तक
चीखती है वह सितारों से चमन तक
मचलती है वह सारे जहां में मचलकर
आसमां सिर पर उठाकर चलते चली वह
बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
दौडती है वह धरती से गगन तक।।

बिखर-बिखर जाती है काली जुल्फें उसकी
बिफर बिफर कर लोटती है जमीं पर यहॉं से वहॉं तक
जाने कैसी है ये चाहत खुदारा
ख्वाब हसीन जाने है कैसे टूटा
सपना वो टूटा जहॉं सारा लुटा
पिया से मिलन का सिलसिला जो टूटा
पहाड उचे चढी कूद नीचे पडी वह
हादासा यहॉं खतम होता नहीं है
गली के जाने किसी मोड पर कभी तो
कल फिर मिलेगी खडी पगली वह लडकी।

बडी खूबसूरत पगली इक लडकी
चली जा रही थी वह न जाने किधर को।।

दहेज

हालांकि रेल्वे स्टेशन के आसपास भिखारियों की कमी नहीं रहती।जैसे ही रेल्वे स्टेशन के करीब पहुँचते हैं,हमारा सामना तरह.तरह के भिखारियों से होता है।लूले लंगड़े अंधे कोढ़ी बच्चे औरत बूढ़े इत्यादि।रेल्वे स्टेशन के आहाते में ओव्हर ब्रिज पर भीख मांगनेवालों की कतारें दिख जाती है।मटमैले जैसे महिनों से नहीं नहाये हों।चीकट दुर्गन्धयुक्त फटे पुराने चीथड़े कपड़े।किसी की रोने की आवाज़,किसी के कराहने की आवाज़,कोई पुकार.पुकार कर भीख मांगता तो कोई बहुत ही कातर होकर गुहार लगता है।इन्ही भिखारियों के बीच में रेल्वे स्टेशन के ओव्हर ब्रिज पर बैठकर भीख मांगते हुए किशन को शायद चार दशक हो गये।ब्रिज पर भीख मांगने के लिए किशन दादा ने अपना एक निश्चत स्थान बना लिया था।जैसे ही रेल्वे प्लेट फार्म से होकर ऊपर बि्रज पर चढ़ते हैं बिल्कुल सामने ही किशन दादा दिखाई देते हैं।किशन दादा के स्थान पर कोई अन्य भिखारी अतिक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर सकता था।अन्य भिखारी किशन दादा से बहुत दूर दूर ही बैठते।उस ब्रिज पर मात्र किशन दादा का ही वर्चस्व रहता था यदि कोई गलती से भी भीख मांगता नज़र आता तो किशन दादा उससे उस दिन की सारी भीख हथिया लेते।उसके भीख मांगने का तरीका भी अन्य भिखारियों की अपेक्षा अलग ही रहता था।अन्य भिखारी उनकी नकल नहीं कर पाते। दाहिना हाथ और बांया पैर वैसे तो बहुत स्वस्थ्य थे लेकिन जब वे भीख मांगने के अपने स्थान पर बैठते तो उन्हे देखकर कोई भी महसूस कर सकता कि वे दाहिने हाथ और बांये पैर से अपाहिज ही है। दाहिना हाथ ढीला कर इस तरह लटकाते कि लगता उनका हाथ वास्तव में पंगु ही है।भीख मांगने की इसी शैली के कारण वे पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से इसी तरह से भीख मांग रहे हैं।चलते समय किशन दादा बांये पैर को घसीटकर चलते और हर किसी को दिखाई देता है जैसे वे वास्तव मे अनाहिज है।यह उनक हुनर था।पांच के पंजे को मैले कुचैले कपड़ों से लपेटकर रस्सी से बांध लिया करते।देखनेवाला दाता उन्हे दखकर भावनावश भीख दे ही देता।चलते वक्त उनके चलने की शैली ऐसी होती कि एक पैर घसीटा जा रहा है और एक हाथ निढाल हुआ जा रहा है।देखते ही तरस आ जता किसी को भी।किशन दादा में एक खासियत यह भी थी कि वे थोड़ी बहुत अंगे्रजी के शब्दों का भी उपयोग बोलचाल में कर लिय करते।उनके अन्य साथी के पूछने पर वे यह कह कर टाल देते कि उन्होने यह अंग्रेजी आने जाने वालों से सुनकर सीखी है किन्तु किशन दादा हरि से कोई बात नहीं छिपाते।हरि ओव्हर ब्रिज के नीचे पायदान के पास बैठकर भीखा मांगा करता और अभी किशनदादा से भीख मांगने के गुर सीख रहा है।हरि अक्सर किशनदादा को अपना गुरू मानता और वह किशनदादा के नक्शे कदम पर चलता।एक दिन यों ही हरि ने किशन दादा को छेड़ा।‘कहाँ तक पढ़े हो दादा’‘ ऐसी बात क्यों करता है रे हरि।क्या कोई भिखारी भी पढ़ा लिखा होता है।’‘ नहीं,बात यह तो नहीं है….फिर भी मन में सवाल उठ ही गया है कि दादा कितनी अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं और हाँ…एक दिन तुम कोई अंग्रेजी अखबार ज़ोर ज़ोर से पढ़ रहे थे।’‘सो तूने कैसे जाना।’‘ जब तुम ज़ोर ज़ोर से पढ़ रहे थे तभी टीटी साहब तुम्हारे पास कुर्सी पर बैठे सुन रहे थे और सुन कर खुश हो रहे थे।दादा तुम्हे याद होगा कि टीटी साहब ज़ोरों से खांस थे और तुम पढ़ते हुए थम गए थे।’ ‘मुझे याद नहीं।’
‘ और टी.टी. साहब ने तुम्हे…सोचकर….हाँ,एक का सिक्का भी बख्शीश में दिया था।’
‘ असल में हरि,मैं नौकरी की तलाश में भटक रहा था।डिग्रियाँ ले लेकर कहाँ.कहाँ नहीं भटका,बता नहीं सकता।पर कहीं नौकरी नहीं मिली।एक दिन देखा एक भिखारी पेड़ के नीचे बैठ भीख के पैसे गिन रहा है।बहुत से रूपये थे उस भिखारी के पास,मैने पूछा तो बताने लगा,ये जो लोग नौकरी करते हैं,हम उनसे कहीं ज्यादा कमा लेते हैं।पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं मिल पाती तब मजदूरी करनी होती है और मजदूरी में भी इतना नहीं मिल पाता कि घर का खर्च पूरा हो सकें।शहरों में तो भिखारियों के बड़े.बड़े संघ काम करते हैं और भिखारियों की यूनियन भी है।उस भिखारी ने मुझे भीख मांगकर रूपये कमाने का तरीका सिखा दिया।फिर क्या,तब से ही मैं यह धंधा बराबर करता आ रहा हूँ,लेकिन दुःख है,मैं अपने घर नहीं जा सकता और यही का होकर हर गया। लम्बी सांसs लेते हुए किशन दादा टकटकी लगाये आसमान की ओर देखाने लगे।शायद सोच रहे हो कि हमारे देश में इतनी बेरोजगारी है कि शिक्षित लोगों को भी भीख का धंधा dरना पड़ रहा है।किशन दादा ने लम्बा बीड़ी का कश लिया और आसमान में धुआं छोड़ने लगे ।चांदनी छिटक रही थी।किशन दादा की आंखों से दो बूंद आंसू लुढ़ पड़े। पारों को पढ़ाया लिखाया नहीं।क्या पता पढ़ने के बाद पारो के लिए उचित दूल्हा मिलता है या नहीं।इसकी चिन्ता किशन दादा को शुरू से ही थी।किशन दादा ने पारो का ब्याह अपनी ही जमात में करना उचित समझा और पारो के लिए वर तलाशने की जहमत उसे उठानी नहीं पड़ी। हरि,किशन दादा की आंखों में पहले से था ही।हरि,किशन दादा के साथ भीख मांगने की मदद करता था।हरि के मां.बाप नहीं थे जब से हरि ने होश संभाला है तब से किशन दादा ही हरि के सर्वस्व रहे हैं।इसलिए किशन दादा को हरि से अच्छा वर कोई दिखाई नहीं दिया।बेटी.जमाई दोनों हमेशा नज़रों के सामने रहेंगे।हरि,भीख मांगने के बाद रात को घर लौटते समय किशन दादा को सहारा देकर अंधेरे कोने तक ले आता और ज्यों ही अंधेरे में आ जाते थे,हरि पीछे रह जाता था और किशन दादा सरपट आगे निकल जाते थे।किशनदादा अपनी फुर्तीली चाल के कारण हरि से दस कदम आगे ही चलते थे।किशनदादा ने पारो की शादी की बात हरि से ही चलाई क्योंकि हरि का अपना कोई नहीं था जो वे किशन दादा ही थे। ‘हरि…पारों अब सयानी हो गई।सोचता हूँ पारो का ब्याह हो जाय तो कम से कम आराम से मर सकूँ।‘ ‘काका,काहे को परेशान होते हो।तुम आदेश तो दो,हरि पारों के लिए दूल्हा ढूँढ निलकालेगा।‘ ‘ सच हरि।‘ ‘ तो क्या मैं ठिठोली कर रहा हूँ।” ‘ तो बस…मेरी बात मान ले…” ‘ सो क्या काका… ‘ तू ही पारो से ब्याह कर ले।‘ ‘ मैं…और पारो से….क्या कह रहे हो काका।‘ हरि के चेहरे पर विस्मय के भाव तैर आये। ‘ कहीं तुम मेरा मजाक तो नहीं बना रहे हों।‘ ‘ नहीं रे हरि….बस, तू मान जा…..
‘ ठीक है काका।यदि ऐसी ही बात है तो….लेकिन हाँ,एक बात कहूँ काका…ब्याह में तुम मुझे क्या दोगे।”
‘तुझे क्या चाहिए।‘‘दे सकोगे।‘‘तू मांग कर के तो देख।‘‘तो मांग लूँ।‘‘हाँ..हाँ..झिझकता क्यों है।‘‘दहेज दे सकते हो तो मैं तैयार हो जाऊँगा।‘‘दहेज और मेरे पास।‘‘हाँ..बहुत दहेज नहीं बस थोड़ा सा ही देना होगा।‘‘क्या है मेरे पास,तू ही बता।‘‘मुझे दहेज में और कुछ भी नहीं चाहिए।दे सको तो रेल्वे की वह पुलिया दे दो जहाँ बैठकर तुम भीख मांगते हो।‘‘लेकिन….‘लेकिन वेकिन कुछ नहीं।यदि पारो का ब्याह करना है तो वह पुलिया तो देना ही होगा।‘आखिर किशन दादा को हाँ कहनी ही पड़ती।दूसरे दिन किशन दादा और हरि पुराने कपड़ों को साफ कर पहने और बाज़ार गये।सारा दिन बाजार घूमते रहे।कई दिन बाद दोनों बाजार गए थे पारो के ब्याह के लिए सामान खरीदने।पारो के लिए साड़ी ब्लाउस,सिन्दूर,कागज,पेटीकोट,पतलून और जूते हरि के लिए।पूजा का थोड़ा सा सामान और दो फूलों की माला…बस…। अगले दिन पारो का ब्याह हरि के साथ सारी जमान के सामने हो गया।सभी भिखारियों को किशन दादा ने अच्छे से अच्छा खाना खिलाया।खूब खाये पीये और नाचे गये।किशन दादा ने जमान के सामने ही कहा.. ”आज से मेरी बेटी पारो के ब्याह के मौके पर जमाई हरि को वह रेल्वे का पुलिया दहेज में दे रहा हूँ।यहाँ मैं तीस साल से भीख मांगने का धंधा करता रहा।अब मेरी जगह मेरा जमाई बैठेगा। दूसरे दिन से ही हरि दहेज से प्राप्त रेल्वे ब्रिज पर उसी स्थान पर जा बैठा जहाँ किशन दादा भीख मांगने के लिए बैठा करते थे।टी टी ने किशनदादा की जगह पर दूसरे भिखारी को बैठा देखकर पूछा.. ” तुम यहाँ कैसे बैठे हो,यहाँ तो… ”हाँ,हुजूर मेरे ससुर किशन दादा ने यह पुलिया मुझे शादी में दहेज में दिया है।आज से मैं ही यहाँ बैठकर भीख मांगा करूँगा।‘ टी टी ,हिर का प्रसन्नचित्त चेहरा देख मुस्कराता रह गया।

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कृष्णशंकर सोनाने
भोपाल, मध्य प्रदेश, India
कृष्णशंकर सोनाने एफ 88.2 तुलसी नगर,भोपाल मप्र दूरभाषः 07554229018,चलितवार्ताः 09424401361 प्रकाशित कृतियां-वेदना,कोरी किताब,बौराया मन,संवेदना के स्वर,दो शब्दों के बीच,धूप में चांदनी,मेरे तो गिरधर गोपाल,किशोरीलाल की आत्महत्या,निर्वासिता..गद्य में गोरी.उपन्यास,आदिवासी लोक कथाएं,कुदरत का न्याय.बाल कहानी संग्रह,क्रोध, प्रेस में उपन्यास.केक्टस के फूल,लावा
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